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    ‘एक देश, एक चुनाव’ की दिशा में बड़ा कदम, 90 दिनों में पास होने की संभावनाओं पर नजर

    News DeskBy News DeskDecember 18, 2024No Comments5 Mins Read
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    ‘एक देश, एक चुनाव’ की दिशा में बड़ा कदम, 90 दिनों में पास होने की संभावनाओं पर नजर
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    One Nation One Election: 'एक देश, एक चुनाव' की अवधारणा को मूर्त रूप देने की पहली कड़ी में केंद्र सरकार ने विपक्षी दलों के भारी विरोध के बीच इससे संबंधित संविधान संशोधन विधेयक और इससे जुड़े एक अन्य विधेयक को मंगलवार को लोकसभा में पेश कर दिया।

    'एक देश, एक चुनाव' से संबंधित विधेयक पेश होने की पहली सीढ़ी पर ही तगड़े विरोध का सामना करना पड़ा और विपक्ष ने मतविभाजन करा अपने इरादे साफ कर दिए। विपक्ष के 198 मतों के मुकाबले 269 सदस्यों का समर्थन हासिल कर सरकार ने विधेयक पेश करने में सफलता हासिल कर ली। मगर संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने की चुनौती को देखते हुए 'एक देश, एक चुनाव' से संबंधित 129वें संविधान संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने की हामी भर दी।

    लोकसभा में 129वें संशोधन विधेयक के साथ केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक 2024 भी पेश किया जिसमें तीन केंद्र शासित प्रदेशों पुडुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर विधानसभा का चुनाव भी लोकसभा चुनावों के साथ कराने का प्रावधान है। कानून मंत्री के दोनों विधेयकों को पेश करने का प्रस्ताव रखते ही विपक्ष ने विधायी और कानूनी सवालों की झड़ी लगाते हुए इसका तीखा विरोध शुरू कर दिया। विपक्ष की आशंकाओं को निराधार बताते हुए मेघवाल ने दावा किया कि प्रस्तावित विधेयक संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत पर हमला नहीं करता।

    लोकसभा में सरकार ने पास कराने के लिए दो विधेयक पेश किए। जिनमें से एक राज्य विधानसभाओं की अवधि और विघटन में बदलाव और उनके कार्यकाल को लोकसभा से जोड़ने का प्रस्ताव करता है, और दूसरा दिल्ली, जम्मू और कश्मीर तथा पुडुचेरी के केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में इसी तरह के बदलाव का प्रस्ताव करता है।

    वर्तमान स्थिति में बीजेपी के पास लोकसभा में दो विधेयक पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। इस स्थिति में सरकार को इन दोनों विधेयकों को पारित कराने के लिए तमाम चुनौतियों से गुजरना पड़ सकता है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व वाले पैनल द्वारा सुझाए गए इन संशोधनों को लोकसभा से पारित होने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

    बहुमत होने के बाद भी भाजपा और उसके सहयोगी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास केवल 293 सांसद हैं। जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले भारत ब्लॉक के पास 234 हैं। इस विधेयक को लोकसभा में पारित कराने के लिए 362 मतों की आवश्यकता होगी।

    संविधान में संशोधन करने के लिए कानून को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से दो-तिहाई की स्वीकृति की आवश्यकता होती है। इस स्थिति में अगर मंगलवार दिन के मतदान का उद्देश्य विधेयक को पारित करना होता, तो प्रस्ताव गिर जाता। एनडीए को बहुमत की स्थिति होने के बाद भी पूर्ण-शक्ति वाली लोकसभा की स्थिति में, भाजपा को 64 और वोटों की जरूरत होगी।

    मंगलवार को विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में विधेयक पेश किया। इस विधेयक पर कई घंटों तक बहस हुई। लोकसभा में 269 सांसदों ने संसद द्वारा इस पर विचार करने के लिए मतदान किया। वहीं, जबकि 198 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। इसके बाद विधेयक को संयुक्त समिति में व्यापक विचार के लिए भेजने पर सहमति बनी।

    बता दें कि संयुक्त समिति की संरचना, जिसमें राज्यसभा के सांसद भी शामिल होंगे उसको ओम बिरला द्वारा 48 घंटों में तय किया जाएगा। ये समय सीमा इस मायनें में और अहम हो जाता है क्योंकि संसद का यह सत्र शुक्रवार को समाप्त हो रहा है। यदि किसी समिति का नाम और कार्यभार तय नहीं किया जाता है, तो विधेयक समाप्त हो जाता है और उसे अगले सत्र में फिर से पेश किया जाना चाहिए। हालांकि, इस बीच एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से बताया कि संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में अधिकतम 31 सांसद होने की संभावना है।

    संयुक्त संसदीय समति में प्रत्येक पार्टी को उसके पक्ष में सांसदों के आधार पर कितनी सीटों मिलेंगे, इसको लेकर अभी कोई जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि, उम्मीद है कि लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी निश्चित रूप से बहुमत हासिल करेगी और समिति की अध्यक्षता भी करेगी।

    आम तौर पर जेपीसी में अधिकतम 31 सांसदों में से 21 लोकसभा से होते हैं। वहीं, एक बार इसके स्थापित होने के बाद समिति के पास रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए 90 दिन का समय होने की उम्मीद है। हालांकि, अंग आवश्यकता पड़ती है तो समयावधि को बढ़ाया भी जा सकता है।

    इस विधेयक का विरोध करते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने विधेयक को जेपीसी में भेजने की मांग करते कहा कि 'एक देश, एक चुनाव' का प्रस्ताव देश के संसदीय लोकतंत्र और राज्यों के लिए खतरनाक है और इसीलिए कांग्रेस इसके खिलाफ है।

    वहीं, तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने कहा कि यह विधेयक राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के कार्यकाल से जोड़ जनादेश को कमजोर करता है। साथ ही राज्य को केंद्र का अधीनस्थ बनाता है। बनर्जी ने दावा किया कि यह विधानसभा की स्वायत्तता को छीन लेगा और यह चुनाव सुधार नहीं, बल्कि एक सज्जन की इच्छा और सपने को पूरा करने का प्रयास है।

    इसके अलावा समाजवादी पार्टी ने भी एक देश, एक चुनाव का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा इसे देश में तानाशाही लाने के उपक्रम के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है। एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने इसे संविधान के प्रतिकूल बताते हुए कहा कि यह विधेयक क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व मिटा देगा।

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