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    छत्तीसगढ़

    लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब विषयक दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का सफल समापन….

    News DeskBy News DeskJune 19, 2026No Comments5 Mins Read
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    लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब विषयक दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का सफल समापन….
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    रायपुर: लोक साहित्य में निहित ऐतिहासिक चेतना, जनजातीय ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को नई दिशा प्रदान करते हुए संस्कृति विभाग के अंतर्गत पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन “लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब” का शुक्रवार को सफल समापन हुआ। महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के सभागार में आयोजित इस सम्मेलन में इतिहासकारों, लोक साहित्य विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और विद्वानों ने लोक परंपराओं में संरक्षित ऐतिहासिक स्मृतियों के महत्व पर व्यापक विमर्श किया।

    सम्मेलन का उद्देश्य लोककथाओं, लोकगाथाओं, जनश्रुतियों और पारंपरिक ज्ञान में सुरक्षित इतिहास को पहचानना, उसका प्रलेखन करना तथा भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने की दिशा में अकादमिक संवाद को प्रोत्साहित करना था। समापन दिवस पर आयोजित तीन तकनीकी सत्रों में प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञों ने अपने शोधपत्रों के माध्यम से लोक साहित्य और इतिहास के गहरे संबंधों को रेखांकित किया।

    लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब विषयक दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का सफल समापन

    ’’लोक परंपराओं में सुरक्षित है पीढ़ियों का ज्ञान’’

    तृतीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ विदुषी डॉ. सत्यभामा आडिल ने की। सत्र में लोक साहित्य में संरक्षित पारंपरिक ज्ञान और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर केंद्रित शोध प्रस्तुत किए गए। डिंडोरी से आए डॉ. विजय चौरसिया ने बैगा जनजाति की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों पर आधारित यह ज्ञान प्रणाली आज भी अनेक जटिल रोगों के उपचार में प्रभावी है।

    महासमुंद की डॉ. अनुसुईया अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों के माध्यम से इतिहास के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया, जबकि डॉ. अरुण कुमार निगम ने महानदी, शिवनाथ, लीलागर और नर्मदा जैसी नदियों से जुड़ी लोककथाओं और जनश्रुतियों का विश्लेषण कर उनके ऐतिहासिक महत्व को सामने रखा। डॉ. पीसी लाल यादव ने पुरातात्त्विक अवशेषों के आधार पर ‘कुँवर अछरिया’ लोकगाथा की ऐतिहासिकता पर प्रकाश डाला, वहीं श्रीमती शकुंतला तरार ने बस्तर के पूजनीय प्रेमी युगल देवता ‘झिटकू-मिटकी’ की लोककथा का भावपूर्ण प्रस्तुतीकरण किया।

    सत्राध्यक्ष डॉ. सत्यभामा आडिल ने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समन्वय से समाज को व्यापक लाभ मिल सकता है तथा ऐसे ज्ञान के संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास आवश्यक हैं।

    लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब विषयक दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का सफल समापन

    लोककला, घोटुल और राष्ट्रीय चेतना पर केंद्रित रहा चौथा सत्र

    चतुर्थ तकनीकी सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ इतिहासकार श्री राहुल कुमार सिंह ने की। इस सत्र में लोककला, जनजातीय संस्थाओं और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विविध विषयों पर चर्चा हुई। डॉ. मृणालिका ओझा ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक कलाकार स्वर्गीय देवदास बंजारे के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि उन्होंने पंथी नृत्य और सतनाम पंथ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच तक पहुंचाया।

    श्री महेश वर्मा ने लोककला और लोकनाट्यों में हास्य-व्यंग्य की भूमिका को सामाजिक जागरूकता का प्रभावी माध्यम बताया। नारायणपुर के श्री शिवकुमार पांडेय ने बस्तर की पारंपरिक सामाजिक संस्था ‘घोटुल’ के अनुशासन, सामाजिक संरचना और सामुदायिक मूल्यों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। श्री विक्रम सोनी ने चालुक्य और काकतीय राजवंशों के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ हल्बा गीतों और जगार परंपराओं के माध्यम से लोक जीवन के ऐतिहासिक भूगोल को समझाया।

    प्रो. किशोर कुमार अग्रवाल ने बताया कि छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य राष्ट्रीय चेतना के विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है तथा इसमें महात्मा गांधी से जुड़े अनेक संदर्भ भी प्राप्त होते हैं। सत्राध्यक्ष श्री राहुल कुमार सिंह ने युवा शोधार्थियों से इतिहास और लोक साहित्य के क्षेत्र में निरंतर अध्ययन एवं अनुसंधान की अपील की।

    राज्य निर्माण, लोकगाथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं पर हुआ गंभीर विमर्श

    पंचम एवं अंतिम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. रुद्र नारायण पाणिग्रही ने की। इस सत्र में राज्य निर्माण, राजनीतिक लोककथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अंतर्संबंधों पर महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किए गए।

    डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद ने राजा कल्याण साय और उनके दरबारी कवियों से जुड़ी लोककथाओं के आधार पर सक्ती, सारंगढ़, जशपुर, बिलाईगढ़ और पेण्ड्रा जैसे क्षेत्रों के नामकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण किया। धमतरी की सुश्री स्मिता अखिलेश ने ‘भंगाराम जात्रा’ पर शोध प्रस्तुत करते हुए भंगाराम देव को लोकन्याय के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित किया।

    प्रो. भूपेंद्र कुमार पटेल ने कहा कि किंवदंतियां इतिहास और कल्पना के मध्य एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती हैं तथा इनके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है। श्रीमती रजनी शर्मा ‘बस्तरिया’ ने मूरिया जनजाति के ‘पूष कोलांग नृत्य’ की विशेषताओं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का विस्तृत परिचय दिया।

    सत्र के अंतिम शोधपत्र में डॉ. प्रताप चंद पारख और डॉ. राजीव जे. मिंज ने छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध प्रेमगाथा ‘लोरिक-चंदा (चंदैनी)’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर संयुक्त शोध प्रस्तुत करते हुए रीवागढ़, आरंग, कुम्हारी और बम्हनी से जुड़े लोक आख्यानों तथा ऐतिहासिक संदर्भों का विश्लेषण किया।

    लोक विरासत के संरक्षण को मिला नया विमर्श

    समापन अवसर पर मंचासीन अतिथियों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों को राजकीय गमछा, प्रमाण-पत्र और स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया। आयोजन के सफल संचालन में नोडल अधिकारी डॉ. पी.सी. पारख, प्रभारी अधिकारी प्रभात कुमार सिंह, विभागीय पुरातत्ववेत्ताओं तथा संस्कृति विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सम्मेलन के सभी सत्रों का संचालन डॉ. आकांक्षा दुबे और अरुण निर्मलकर ने संयुक्त रूप से किया।

    दो दिवसीय यह राज्य स्तरीय सम्मेलन लोक साहित्य में संरक्षित ऐतिहासिक स्मृतियों, जनजातीय ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं शोध को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ। लोक परंपराओं में सुरक्षित इतिहास के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण से न केवल अतीत को समझने में सहायता मिलेगी, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक पहचान को भी सशक्त आधार प्राप्त होगा।

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