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    Home»धर्म»शनिदेव के हैं नौ वाहन
    धर्म

    शनिदेव के हैं नौ वाहन

    News DeskBy News DeskNovember 7, 2024No Comments5 Mins Read
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    शनिदेव के हैं नौ वाहन
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    सूर्यपुत्र शनिदेव न्याय के देवता हैं हालांकि लोग उनके कोप से भयभीत रहते हैं पर वह हमेशा ही कार्यों के अनुरुप परिणाम देते हैं। उनके कई वाहन हैं।  शनि के वाहनों की बात करते हुए सामान्य। रूप से कौवे के बारे में ध्या न आता है, लेकिन उनके कौवे सहित कुल 9 वाहन है। जिनमें से कई को ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व के अनुसार बेहद शुभ माना गया हैं। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि वे सभी आपके लिए भी शुभ ही हों। इसलिए ये जानना अत्यंित आवश्याक है कि कौन शुभ है और कौन अशुभ। शास्त्रों  की माने तो शनि जिस वाहन में सवार होकर किसी व्येक्तिर की कुंडली में प्रवेश करते हैं उसकी राशि की गणना करके तय होता है कि उनका आगमन व्यडक्तिे के लिए अच्छाि है या बुरा।
    इस गणना की विधि सुनने में कठिन लगती है पर है गणित के सूत्रों की तरह एक दम तय है। इसके लिए जन्म नक्षत्र की संख्या और शनि के राशि बदलने की तिथि के नक्षत्र की संख्या जोड कर उसके योगफल को नौ से भाग करना होता है। इस गणना से मिली संख्या के आधार पर ही शनि का वाहन निर्धारित होता है। एक दूसरी विधि भी है, इसमें शनि के राशि प्रवेश करने की तिथि की संख्या, ऩक्षत्र संख्या, वार संख्या और नाम के प्रथम अक्षर संख्या सभी को जोडकर योगफल को 9 से भाग देदें, जो शेष संख्या आयेगी वो शनि के वाहन की जानकारी देगी। दोनो विधियों मे यदि शेष 0 बचे तो मानना चाहिए कि आपकी अपेक्षित संख्याच 9 है।
    सूर्य देव का परिवार
    रविवार को सूर्यदेव का दिन माना जाता है। यश और सम्मान हासिल करने  के लिए सभी लोग उनकी पूजा करते हैं।  पर क्या0 आप सूर्यदेव के परिवार को जानते हैं। सूर्य देव का परिवार काफी बड़ा है। उनकी संज्ञा और छाया नाम की दो पत्निोयां और दस संताने हैं। जिसमे से यमराज और शनिदेव जैसे पुत्र और यमुना जैसी बेटियां शामिल हैं। मनु स्मृ ति के रचयिता वैवस्वत मनु भी सूर्यपुत्र ही हैं।
    सूर्य देव की दो पत्नि यां संज्ञा और छाया हैं। संज्ञा सूर्य का तेज ना सह पाने के कारण अपनी छाया को उनकी पत्नीे के रूप में स्थासपित करके तप करने चली गई थीं। लंबे समय तक छाया को ही अपनी प्रथम पत्नीं समझ कर सूर्य उनके साथ रहते रहे। ये राज बहुत बात में खुला की वे संज्ञा नहीं छाया है। संज्ञा से सूर्य को जुड़वां अश्विनी कुमारों के रूप में दो बेटों सहित छह संताने हुईं जबकि छाया से उनकी चार संताने थीं।
    देव शिल्पीि विश्वशकर्मा सूर्य पत्नी् संज्ञा के पिता थे और इस नाते उनके ससुर हुए। उन्होंिने ही संज्ञा के तप करने जाने की जानकारी सूर्य देव को दी थी।
    धर्मराज या यमराज सूर्य के सबसे बड़े पुत्र और संज्ञा की प्रथम संतान हैं।
    यमी यानि यमुना नदी सूर्य की दूसरी संतान और ज्येसष्ठा पुत्री हैं जो अपनी माता संज्ञा को सूर्यदेव से मिले आर्शिवाद के चलते पृथ्वीत पर नदी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
    सूर्य और संज्ञा की तीसरी संतान हैं वैवस्वत मनु वर्तमान (सातवें) मन्वन्तर के अधिपति हैं। यानि जो प्रलय के बाद संसार के पुर्निमाण करने वाले प्रथम पुरुष बने और जिन्होंिने मनु स्मृकति की रचना की।
    सूर्य और छाया की प्रथम संतान है शनिदेव जिन्हेंे कर्मफल दाता और न्याययधिकारी भी कहा जाता है। अपने जन्म  से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे। भगवान शंकर के वरदान से वे नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर नियुक्तं हुए और मानव तो क्या देवता भी उनके नाम से भयभीत रहते हैं।
    छाया और सूर्य की कन्या तप्तिै का विवाह अत्यन्त धर्मात्मा सोमवंशी राजा संवरण के साथ हुआ। कुरुवंश के स्थापक राजर्षि कुरु का इन दोनों की ही संतान थे, जिनसे कौरवों की उत्पत्ति हुई।
    सूर्य और छाया पुत्री विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रविष्ट हुई। भद्रा काले वर्ण, लंबे केश, बड़े-बड़े दांत तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी कड़क बताया गया है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया है।
    सूर्य और छाया की चौथी संतान हैं सावर्णि मनु। वैवस्वत मनु की ही तरह वे इस मन्वन्तर के पश्चाडत अगले यानि आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे।
    संज्ञा के बारे में जानकारी मिलने के बाद अपना तेज कम करके सूर्य घोड़ा बनकर उनके पास गए। संज्ञा उस समय अश्विनी यानि घोड़ी के रूप में थी। दोनों के संयोग से जुड़वां अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई जो देवताओं के वैद्य हैं। कहते हैं कि दधीचि से मधु-विद्या सीखने के लिये उनके धड़ पर घोड़े का सिर रख दिया गया था, और तब उनसे मधुविद्या सीखी थी। अत्यंओत रूपवान माने जाने वाले अश्विनीकुमार नासत्य और दस्त्र के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
    सूर्य की सबसे छोटी और संज्ञा की छठी संतान हैं रेवंत जो उनके पुनर्मिलन के बाद जन्मीे थी। रेवंत निरन्तर भगवान सूर्य की सेवा में रहते हैं।

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